- डा. श्रीनिवास मिश्र
'अटकते-भटकते' डॉ. श्यामसुंदर दुबे की आत्मकथा है। इस आत्मकथा में गाथा सप्तशती की तरह सात अध्याय हैं। जैसे-जैसे रचनाकार की जीवन-नौका बढ़ती है, वैसे-वैसे उनका मन मस्तिष्क घटनाओं को आइने के प्रतिबिंब की तरह साफ देखता चलता है। प्रथम अध्याय का शीर्षक कवितावली के उत्तरकांड से लिया गया है। ''खेती न किसान को भिखारी को न भीख से ली गई है। शीर्षक गरीबी की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करता है। दुबे जी कुल छह पृष्ठ में अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि को खंगालते हैं। पुस्तक की शुरूआत इस पंक्ति से होती है - हजार वर्ष पूर्व जैराजमऊ गांव कैसा रहा होगा ? प्रश्न से शुरू करते हुए लेखक अपने अटकते-भटकते की अर्थवत्ता खोजता हुआ चलता है वैसे प्रश्न से शुरू करने से लक्ष्य पहले ही निर्धारित हो जाता है।
जैराजमऊ कन्नौज के पास कोई गांव था जहां से दुबे जी के पूर्वज बुंदेलखंड में आए होंगे। हर्षवर्धन के बाद कन्नौज को कोई प्रतापी राजा नहीं मिला जो उनकी विरासत संभाल पाता। वैसे कन्नौज वह स्थान था जिसका आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका बहुत ज्यादा थी। गंगा का यह उर्वर मैदान व्यापार-वाणिज्य के साथ रेशम मार्ग भी था। कन्नौज को लेकर पाल,प्रतिहार और राष्ट्रकूटों में त्रिकोणात्मक संघर्ष हुआ। यह सर्वविदित है कि अधिकार-लिप्सा की लड़ाई में जनता को अनेक बार यत्र-तत्र विस्थापन के लिए विवश होना पड़ा होगा।
इसी प्रकार के विस्थापन में दुबे जी के परिवारी जन इधर आ गए होंगे। ध्यान देने वाली बात यह है कि इनके पुरखे संस्कृत के महान कवि राजशेखर के करीबी रहे, कहीं न कहीं पीढ़ी दर पीढ़ी उनके गुणसूत्र का स्थानांतरण संतानों में होता रहा और श्यामसुंदर दुबे के रूप में हमारे सामने यह प्रतिभा मूर्तिमान है। सत्ताओं के उत्थान-पतन में प्रतिभा पलायन स्वाभाविक है। लेखक ने अपने बाबा मोहन के जीवन का जो चित्र खींचा है वह मोहन संज्ञा नहीं सर्वनाम है। दारुण दु:ख सहते हुए उन्होंने क्या-क्या नहीं किया, दफाई मजदूरी का काम तक किया, श्रम से डिगे नहीं। गुजारा करने के लिए गांव से एक बार जो बाहर हुए तो जिंदगी होम हो गई। बहादुर शाह जफर की तरह दो गज जमीन भी नसीब नहीं हुई। गांव से चालीस किमी दूर एक दिन उनकी असामयिक मृत्यु हो गई। बंधु-बांधव भी साथ नहीं थे। असामयिक निधन की सूचना मिलने पर लेखक के पिता और मां पर जैसे बज्रपात हो गया होगा। इस भयानक दुख की केवल कल्पना ही की जा सकती है।
दूसरा पाठ सतह से उठते पिता शीर्षक से है जिसमें कुल तेरह पृष्ठ हैं। दुबे जी कहते हैं कि बाबा की मृत्यु के बाद मेरे पिता दिगी-दादपुर चले गए जो उनके बहन की ससुराल थी। मां अपने इकलौते बेटे को कैसे छोड़ पाई होगी कल्पनातीत है, लेकिन गरीबी क्या नहीं कराती। पिता भी मजबूरन मॉं को छोड़कर अनंत आकाश के नीचे अपने अदृश्य भविष्य को लेकर बहन के यहां प्रस्थान किए। वहां भी दु:ख ही अधिक था। बहन के यहां पशुचारक के रूप में उनका काम निश्चित हुआ। वे बहन के यहां इसी प्रकार बरेदी का काम मनोयोग के साथ करने लगे। लेकिन बहन के यहॉं भी अड़चन आने लगी क्योंकि दीदी की सास को उनका रहना पसंद नहीं था। दीदी और उनकी सास का संबंध अप्रीतिकर होने लगा।
लेखक के पिता बड़े स्वाभिमानी और कर्मठ थे कभी ऊफ नहीं किया। उन्होंने इसे भी अवसर के रूप में लिया तथा दीदी के ससुर जो सरल स्वभाव के थे, से ओनामासी धर्म की दीक्षा लेकर पढाई का शुभारंभ किया। वे स्वाध्याय से संस्कृत, ज्योतिष और हिंदी आदि का ज्ञान प्राप्त करने लगे। उनके लिए दिगी-दादपुर चाहे जैसा रहा हो लेकिन निर्णायक साबित हुआ। ज्ञान की प्रथम रश्मि वहीं मिली और यहीं भविष्य की पूर्वपीठिका तैयार हुई। कुछ दिन बाद गॉंव लौटे तो घर बनवाया,अपनी सामाजिक आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया। अपने कर्मठ व्यक्तित्व को निखारा। पूजा-पाठ से लेकर ज्योतिष की अच्छी जानकारी हासिल की और चारित्रिक बल के दम पर सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त की।
तीसरे अध्याय में लेखक ईश्वर को हाजिर नाजिर मानकर सच लिखने की बात करता है, क्योंकि प्रथम दो पाठ पूर्वपीठिका थे। उनका आधार सुनी-सुनाई बातें थीं। इसीलिए दुबे जी आगे किसी अनुमान आधारित सुनी हुई बातों से हटकर कबीर की तरह ''मैं कहता आंखिन की देखी'' पर यकीन करते हैं। तीसरा अध्याय पन्द्रह पृष्ठों में समाहित है। इसमें अपनी पढ़ाई के प्रारंभिक दौर को लेखक याद करता है। अपने बचपन की चंचलता को याद करके वे भावुक हो जाते हैं। अपने जिद्दी स्वभाव के कारण माता-पिता को सांसत में डालने का प्रसंग बेहद मार्मिक है। तीसरी तक की पढ़ाई वे पिता जी के संरक्षण में स्वाध्यायी विद्यार्थी के रूप में करते हैं आगे की चौथी कक्षा की परीक्षा फतेहपुर में अपने बहन के यहॉं से पास करते हैं और सेंटर में टॉप करते हैं। लेखक ने इस टॉप करने की घटना को अपने जीवन का टर्निग प्वाइंट माना है। छठवीं तक पढ़ाई फतेहपुर में ही किए और उसके बाद हटा में रहकर ग्यारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी की। उनके जीवन की पहली कविता आदर्श हाईस्कूल हटा में पढ़ते समय लिखी थी और वह बालभारती में प्रकाशित भी हुई। संभवत: इस समय लेखक सातवीं आठवीं का विद्यार्थी रहा होगा।
रचनाकार बहुमुखी प्रतिभा सम्मन्न था, इसलिए उसमें अनेक प्रकार की कविताओं के साथ-साथ चित्रकारी में भी अच्छी रुचि थी। जिसका प्रमाण हटा के विद्यालय में अभी हाल तक सुरक्षित तुलसीदास का चित्र है। आगे की पढ़ाई के लिए लेखक का दमोह जाना और वहां पर स्नातक के तीन वर्ष बिताना बेहद महत्वपूर्ण है। ग्रामीण पृष्ठभूमि का एक विद्यार्थी अपना गांव बर्तलाई छोड़ा, फतेहपुर रहा, हटा प्रवास किया अब दमोह जाकर भविष्य निर्मित करने की बारी थी। दमोह प्रवास का प्रारंभ जुलाई की शाम से होता है। आगे की पढ़ाई के लिए लेखक को दमोह में रहने की व्यवस्था करनी थी। इस व्यवस्था करने के क्रम में दमोह बस स्टैण्ड से सागर रोड पर लुकायन के घर की ओर पिता जी का शाम के अंधेरे में चारपाई को अपने सिर पर रखकर झुकी कमर के सहारे ले जाने की घटना जवान बेटे दुबे जी को आहत कर देती है। लेखक को पिता की यह दशा बहुत पीड़ा देती है, वे अपने आंसू रोक नहीं पाते हैं। यह एक संवेदनशील युवक के हृदय की स्वाभाविक वेदना है और घटना केवल दुबे जी को ही अश्रुपूरित नहीं करती बल्कि पाठक को भी भावविगलित कर देती है।
बाइस पृष्ठों में फैला यह दमोह प्रसंग लेखक के बनने-गढ़ने की प्रयोगशाला रही। लेखक यहीं दिनकर सोनवलकर को श्रध्दाभाव से स्मरण करता है तथा उनके बताये गये साहित्य के मार्ग पर चल पड़ता है। यद्यपि इसमें रचनाकार की पहले से ही भीतरी स्वीकृति थी। खुरई में काव्यपाठ, दमोह का कवि सम्मेलन, और विभिन्न प्रकार की साहित्यिक हलचल का वृत्तान्त शोधार्थियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण तथ्यों से परिचित कराने वाला है। पिता के बीमार होने पर लेखक ने उनकी सेवा-सुश्रूषा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।दमोह को जिन शब्दों में लेखक विदा किया वह मार्मिक है। बस ने बस स्टैण्ड सिविल लाइन सागर नाका छोड़ा, ऐसा लगता है कि रचनाकार उन्हें भूलना नहीं चाहता लेकिन कहा गया है कि परिंदा अपनी पकड़ जब तक डाली से नहीं छोड़ता तब तक वह उड़ नहीं सकता। अगर उडान भरना है तो स्थान छोड़ना होगा। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने शिरीष के फूल में कहा है कि हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, तभी कालदेवता की मार से बच सकते हो रूके कि मरे।
एक बार फिर राहुल सांकत्यायन की तरह लेखक अपना शहर छोड़ रहा था और ह्रदय में कसक लिए सागर प्रस्थान कर रहा था। सागर वही शहर है जहां हरिसिंह गौर ने मकरोनिया की पहाड़ी पर एक सुंदर विश्वविद्यालय स्थापित किया था। यहां के छात्रों और गुरूओं ने प्रदेश, देश ही नहीं विदेशों में भी अपनी गरिमा की छाप छोड़ी है। उस दौर में सागर विश्वविद्यालय अपने उत्कर्ष की पराकाष्ठा पर था। पठन-पाठन का बेहतरीन माहौल था। लोग सागर को श्रध्दा की दृष्टि से देखते थे। सागर में रहकर लेखक अपने अभीप्सित को प्राप्त करता है. डा. भगीरथ मिश्र का शोधछात्र होना बहुत बड़ी उपलब्धि थी। हिंदी के साहित्यकारों का जमावड़ा था सागर। लेखक सागर में अपने को भर रहा था, वैसे भी जब तक आप खुद को भरेंगे नहीं तब तक रचना कैसे छलकेगी। सागर को दुबे जी अपनी गागर में भर रहे थे। उन्हें इसका खूब मौका भी मिला। एम.ए. पूर्वार्द्ध में विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग को बर्तलाई के बालक ने टॉप किया था।
लेखक को एम.ए. प्रीवियस में नौ सौ रूपये की स्कालरशिप मिली थी, कुछ उधार लेकर जमीन खरीदने का उपक्रम पिता की इच्छा का पूर्ण करना ही नहीं बल्कि अपनी जिम्मेदारी का एहसास करना भी है। सागर में रहते हुए नौकरी की तलाश में विदिशा जाकर साक्षात्कार देना और बिहारी पर पूछे गए प्रश्न का जवाब निर्भिकतापूर्वक देना आत्मविश्वास को प्रदर्शित करता है। जो होना था वही हुआ,लेखक चयन नहीं हो सका।
ठीक उसी समय म.प्र. उच्च शिक्षा विभाग में नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकला लेखक उसे तुरंत भरकर अध्ययन के कर्मपथ पर अग्रसर हो गया। एक दिन डाकिया नियुक्ति का पत्र लेकर आया। नौकरी की सूचना पाने पर भागीरथ मिश्र अनयमनस्क हुए परंतु दुबे जी को अपनी समसामयिक परिस्थितियों का ज्ञान था, उस समय उच्च शिक्षा में अधिकतम उम्र पच्चीस वर्ष थी और उन्हें पच्चीस के होने में तीन माह ही बचा था। लिहाजा अंबिकापुर जाना तय कर लिया, इस निर्णय को पिता-माता को नहीं बताया दमोह के पास से अंबिकापुर की गाड़ी पकड़ ली। सागर संघर्ष का आगर रहा वह बहुत कुछ दिया था लेकिन अब वह भी छूट रहा था। लेखक भारी मन से अदृष्ट पथ पर अटकते-भटकते अंबिकापुर प्रस्थान करता है।
अंबिकापुर का समय कुल तेरह वर्ष का था और लेखक ने उसे उनचास पृष्ठों में याद किया है। अंबिकापुर की आबादी लगभग अठारह हजार के करीब थी परंतु इस छोटे शहर में साहित्यिक हलचल बराबर थी।उसी समय नया प्रतीक जैसे पत्र में लेखक की रचना का प्रकाशित होना बड़ी बात थी। अप्रैल सन् 1974 में पिता के बुलाने पर वे घर आए। पिताजी बहुत बीमार थे पिताजी ने कहा कि बेटा मेरा परवाना आ गया है। अब मैं प्रस्थान करना चाहता हूं। इस तरह पिताजी का भी साथ छूट गया। पिता की पूंजीभूत थाती को समेटकर दुखी मन से मां के साथ कर्मभूमि अंबिकापुर रवाना हुए। माता जी की सेवा-सुश्रूषा उन्होंने अत्यंत मनोयोग से की किन्तु वे भी ज्यादा दिन नहीं रह सकीं। अंबिकापुर में उनका निधन हुआ।
अशोक बाजपेई का अंबिकापुर में कलेक्टर के रूप रहना भी लेखक के लिए सहायक सिध्द हुआ। दुबे जी के निर्देशन में अनेक विद्यार्थियों ने पीएच.डी. किया कुछ उच्च पदों पर पहुंचे और आज भी लेखक के प्रति कृतज्ञ हैं। सन् 1981 बीतते-बीतते उन्हें अकेलापन लगने लगा क्योंकि साथ के आत्मीय जन ट्रांसफर पर यत्र-तत्र चले गए थे। लिहाजा उन्होने अपना स्थानांतरण कराने का मन बनाया। मुझे अंबिकापुर लेखक की एक और प्रयोगशाला लगी जहां वह लेखनी को धार दे रहे थे। कालमृगया जैसी पुस्तक वहीं की देन है। लेखक के लिए अंबिकापुर कभी छूटा नहीं, आज भी उनकी यादों में जिंदा है। वहां के लोगों के आत्मीय लगाव को लेखक ने जिस तरह से याद किया है वह कृतज्ञभाव है। अंबिकापुर के लोगों का अश्रुपूरित नेत्रों से विदा करना एक लेखक की बड़ी सफलता है।
घर वापसी का सुख दु:ख पाठ चौरासी पृष्ठों में फैला है यह लेखक के अंतस को बहुत कुछ खोलने वाला है। घर तो आ गए लेकिन लेखक कुछ दिन तक इस सोच में रहा कि हटा आने का मेरा निर्णय सही था या गलत। हटा ने बहुत कुछ दिया था अब उसे उसे लौटाने की बारी थी इसलिए उन्होंने हटा में रहते हुए बड़े काम किए। हटा कालेज में पठन-पाठन का माहौल बनाने में दुबे जी का योगदान अहम है। हटा के बाद दमोह में प्राचार्य बनकर जाना और वहां बारह महीने पहले ही स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ले लेना दंग करने जैसा निर्णय रहा। उसी बीच सागर विश्वविद्यालय के मुक्तिबोध सृजनपीठ का डायरेक्टर बनाया जाना एक सुखद घटना है।
अटकते-भटकते आत्मकथा में लेखक केवल अपने से ही संपृक्त नहीं होता बल्कि समाज की तत्कालीन व्यवस्थागत कमियों पर अपनी टिप्पणी भी देता है। वे एक ओर अंबिकापुर की सभ्यता, संस्कृति बोली-बानी, पहनावा खानपान, नृत्य-गीत को आत्मसात कर रहे थे तो दूसरी ओर अपनी रचनाओं के माध्यम से अनेक विषयों पर सार्थक टिप्पणी भी कर रहे थे। आखिर सृजनात्मकता भी तो अन्तत: यही होती है।